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Name : भूख पर पहरे
वरिष्ठ रचनाकार डॉ. कैलाश गुप्त 'सुमन' जी पिछले चार दशकों से निरन्तर छन्द की साधना में रत हैं और उनका कहना भी आया है। हाल ही में मुझे उनकी पाण्डुलिपि 'भूख पर पहरे' के लगभग पाँच दर्जन गीतों से एक साथ गुज़रने का अवसर मिला है। इन गीतों का गहन पारम्परिक शैली में है। सम्भवतः इसके पीछे पारम्परिक छन्दों की सुदीर्घ साधना भी एक कारक रही है। सुमन जी गीत, दोहा, सोरठा, कुण्डलिया, छप्पय और घनाक्षरी जैसे पारम्परिक छन्द साधिका लिखते आ रहे हैं। साथ ही बाल साहित्य में भी आपकी अच्छी खासी पैठ है।
यही कारण है कि भिन्न भावभूमियों के विविध गीतों से सुसज्जित खूबसूरत गुलदस्ते में अनेक रंग के गीतनुमा पुष्पों पर पाठक मन रीझा-रीझा जाता है।
'भूख पर पहरे' के गीतों का वर्गीकरण के आधार पर मोटे तौर से, सामाजिक समरसता, प्रकृति और पर्यावरण, आर्थिक असमानता, मूल्यबोध, घर-परिवार, तीज-त्योहार, ईश-आराधना, भौगोलिक स्थिति, प्रेरणा पुरुष और समसामयिक सन्दर्भ के साथ वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य जैसे अनेक विषयों में अलग-अलग बाँटा जा सकता है। डॉ. कैलाश गुप्त 'सुमन' जी के गीतों के परिप्रेक्ष्य में यदि सार संक्षेप में कुछ कहा जाय तो इन गीतों का मूल वैशिष्ट्य इनमें युगीन प्रासंगिकता का होना है। इसीलिए यह पाठक के मर्म दूर तक चलते हैं और देर तक याद बने रहते हैं।
दृश्य है उनका जिन्दगी से जुड़े एक गीत का अंश -
"प्राणवायु के बिना टूटती,
साँसों की सरगम।
जीवन अगर बचाना है तो,
पेड़ लगाएँ हम।"
"वसुधा विहीन हो रही
उसे वसन पहनाओ।
दुष्ट दुशासन नहीं, कृष्ण-सा
Country of Origin : India
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